भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में आर्कटिक सहयोग और व्यापार साझेदारी मजबूत करने पर बनी सहमति

नई दिल्ली। भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन 2026 के दौरान भारत और नॉर्डिक देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत बनाने पर सहमति बनी। 19 मई 2026 को ओस्लो में आयोजित तीसरे भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में हरित प्रौद्योगिकी, डिजिटल नवाचार, स्वच्छ ऊर्जा, सामुद्रिक अर्थव्यवस्था और आर्कटिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को नई दिशा देने पर जोर दिया गया।

शिखर सम्मेलन में व्यापार, निवेश, अनुसंधान, रक्षा उत्पादन और उभरती प्रौद्योगिकियों में सहयोग बढ़ाने पर विशेष चर्चा हुई। भारत और नॉर्डिक देशों के बीच साझेदारी की शुरुआत वर्ष 2018 में पहले भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन से हुई थी। तब से यह संबंध पारंपरिक कूटनीति से आगे बढ़कर हरित विकास, सतत विकास और नवाचार आधारित रणनीतिक सहयोग में बदल गया है।

भारत ने शिखर सम्मेलन में अपनी आर्कटिक नीति को भी प्रमुखता से रखा। भारत ने कहा कि आर्कटिक क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव मानसून, खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा और समुद्री क्षेत्रों पर पड़ सकता है। इसी कारण वैज्ञानिक अनुसंधान, जलवायु संरक्षण, आर्थिक विकास, कनेक्टिविटी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को भारत की आर्कटिक नीति के मुख्य स्तंभों में शामिल किया गया है।

Denmark, Finland, Norway, Sweden और Iceland के साथ भारत के आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। स्वच्छ ऊर्जा, आईटी, समुद्री सहयोग, डिजिटल तकनीक, शिक्षा और शोध जैसे क्षेत्रों में निवेश और भागीदारी तेज हुई है।

शिखर सम्मेलन के दौरान “हरित प्रौद्योगिकी और नवाचार रणनीतिक साझेदारी” को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया। इसके तहत नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, टिकाऊ विनिर्माण, जल प्रबंधन, डिजिटल बुनियादी ढांचा और जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जाएगा। साथ ही 6जी, साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य तकनीक और STEM अनुसंधान में साझेदारी मजबूत करने पर भी सहमति बनी।

भारत-ईएफटीए व्यापार और आर्थिक भागीदारी समझौते (TEPA) को भारत-नॉर्डिक संबंधों में “नए स्वर्ण युग” की शुरुआत माना जा रहा है। इससे व्यापार बाधाएं कम होने, निवेश प्रवाह बढ़ने और रोजगार सृजन को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत और नॉर्डिक देशों के बीच यह बढ़ती साझेदारी केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि टिकाऊ विकास, जलवायु सुरक्षा, डिजिटल परिवर्तन और वैश्विक रणनीतिक संतुलन के लिए भी एक महत्वपूर्ण मॉडल बनकर उभर रही है।

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